Child labour story – एक कहानी छोटू की

 

Child labour story

नंगा पैर, अध् नंगा शारीर और बाल जैसे धुल-मिट्टी से सना हो. मई-जून की तपती गर्मी. कोई इस गर्मी में पैर में चप्पल-जूते लगाकर भी नहीं निकले. बदन को जला देने वाली गर्मी. लोग गर्मी से बचने के लिए घर से नहीं निकल रहे थे. जो निकल भी रहे थे या तो अपने कारों में या बाइक पर. पैदल तो इक्का-दुक्का ही देखता. इतनी तपती धुप में छोटू अपने सर पर ककड़ी से भरी टोकरी लेकर बाज़ार जा रहा था.

10 साल का ‘छोटू’. हाँ, गावं और घर वाले यही पुकारते थे उसे. सावला-सा बदन, फटी हुई पैन्ट और अध् फटी हुई बनियान यही उसके वस्त्र थे. तपती रोड पर पैर जलने से बचने के लिए वह रोड के बगल में धुल पर चलने लगा मगर इस गर्मी में धुल भी जल रहा था. एक छोटे से लड़के को सर पर टोकरी लिए चलते देखकर लोग अचम्भा हो रहे थे.

Child labour story

Child labour story  – उसके पिता भी नही रहे 

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पेट की भूख मिटने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है. ये बात तो वही बता सकता है जो भूखे पेट सोया है. इतनी गर्मी में नंगे पैर और नंगे बदन निकलना तो छोटू भी नहीं चाहता था. मगर क्या करे, नहीं करेगा तो खायेगा क्या? ककड़ी बेचने का काम उसके माँ किया करती थी. मगर कुछ दिन से उसकी तबीयत ख़राब हो गई. तबियत ख़राब होने के वाबजूद जब तक चलने का हिम्मत था. तब तक खुद ही लेकर आई. अब वह खाट से उठ भी नहीं सकती. बिन खाय-पिए कब तक काम होगा. बीमार तो पड़ना ही था.

छोटू का पिता. एक मजदुर था. फैक्टरी में काम करता था. जब वह कमाता था. पूरा परिवार खुश था. जितना कमाता उतना में ही सबको खुश रखता था. दिन-रात काम करने का नतीजा यह निकला की वह टीबी का मरीज हो गया. जो भी कुछ घर में रखा था, दवाई में खर्च हो गया. छोटू की माँ ने अपने गहने तक बेच डाले दवाई के लिए. मगर फिर भी उसे बचा नही पाई.

 

Child labour story – उसकी माँ घर-घर जाकर शब्जी बेचने लगी

Child labour story

उसके मरने के बाद घर में खाने के लाले पड़ गये. फिर कमाने का जिम्मा उसके माँ ने उठाया. कुछ पैसे साहूकार से ली. उस से सब्जी खरीदती और घर-घर जाकर बेचती.. बिना खाना खाय दिन भर सर पर शब्जी की टोकरी उठा कर उस गावं से उस गावं बेचती. किसी गावं में दो रोटी मिल जाता वही खा लेती और फिर पुरे दिन शब्जी बेचती. उसके बाद शाम को घर वापस लौटती और खाना बनाती. फिर सुबह निकल पड़ती.

धीरे-धीरे उसका भी स्वस्थ्य गिरने लगा. फिर भी उसने काम नहीं छोड़ा. एक दिन भी काम छोड़ने पर भूखे रहने की नौबत आ जाती. एक दिन इतना तबियत ख़राब हुआ की रास्ते में ही चक्कर खाकर गिर पड़ी. शब्जी से भरी पूरी टोकरी बिखर गई. लोगो ने उठाकर घर लाया. अब उसमे चलने तक की हिम्मत नहीं बची थी. पेट पालने के लिए अब घर जिम्मा उठाया 10 साल का छोटू ने. कर भी क्या सकता था. माँ तो अब चल नहीं सकती थी और भूखे पेट सोया नहीं जाता. पेट की भूख उम्र थोड़ी ही देखता और न परिस्थिति. उसे तो बस भोजन चाहिए कही से भी किसी भी हालत में.

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Child labour story – छोटू खुद की काम करने चल पड़ा

 

पसीने से लथपथ छोटू बाजार पहुच गया. जहाँ शब्जियाँ बिकती थी. वहाँ उसने भी अपना टोकरी रखा दिया. तपती धुप में इतनी दूर से आने पर उसका गला सूखने लगा. प्यास से उसका मुहँ सटने लगा. एक पल उसने टोकरी में पड़ी ककड़ियों को ललचाई निगाहों से देखा. मुहँ में पानी आ गया. सोचा एक खा लू. मगर खा लूँगा तो बेचूंगा क्या. माँ के लिए दवा भी ले जाना है. खाना के लिए समान भी खरीदना है. …’नहीं…नहीं…मैं नहीं खाऊंगा’ उसने एक ककड़ी उठाई थी उसे वैसे ही टोकरी में रखा दिया. और पास पड़े नल के पास….गटागट …पानी पी लिया.  .

वह भी अब दुसरे बेचने वालो को तरह जोर-जोर से चिल्ला के बेचने लगा. जो लोग खरीदने के लिए आते उनको बच्चा देखकर दया आ जाता और उसे से खरीद लेते. कुछ लोग उसे छोड़कर आगे निकल जाते और कुछ देर बाद उसके पास वापस आकर खरीदते. कुछ ऐसे भी थे जो कम भाव पर ही लेना चाहते. सोचते बच्चा है इसको तो ऐसे ही उल्लू बना दूंगा. छोटू भी न चाहते हुए उन्हें कम दामो में बेच देता. इस तरह शाम होते-होते उसने सारी ककड़ियों को बेच दिया.

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Child labour story – पैसे से उसने माँ के लिए दवा ख़रीदा 

 

पैसा लेकर वह मेडिकल के दुकान पर गया. वहाँ से अपनी माँ के लिए दवाइयां खरीदी और फिर कुछ खाने के लिए सामान भी खरीदा और कुछ पैसा बचा भी लिया. कल भी आने थे. खेत वाले को पैसा देना था जिस से ककड़ियां उधार लिए थे.

सारा समान लेकर वह झूमते हुए घर जा रहा था. उसके चहरे पर अब मुस्कान था. उसने अपने माँ का मदद किया. उसने अपने माँ के लिए दवा भी खरीदा है. माँ देखेगी तो कितना खुश होगी. आज मैं पहली बार पैसा कमाया हूँ. मैं भी पैसा कमा सकता हूँ और माँ को दवा करा सकता हौं. उसने टोकरी को टोपी बना लिया उसे अपने सर पर ढक किया और ख़ुशी से घर जाने लगा.

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Child labour story  – छोटू labour बन कर भी खुश था

 

उसका बचपन खत्म हो गया था. उसका पढाई खत्म हो गया था. फिर भी वह खुश था. क्यों की उसने पेट की भूख को शांत करना जान गया था. जो उसी उम्र में उसे बहुत कुछ सिखा गई. पेट की भूख को उम्र नहीं देखती और ना ही परिस्थिति.

 

 

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