Diwali  – festival of light  ( ज्योतिपर्व दिवाली )  

 दिवाली

दिवाली कब मनाई जाती है

कार्तिक मास के अमवस्या के दिन दीपावली का त्यौहार मानते है. अंग्रजी कैलेन्डर के अनुसार यह त्यौहार अक्टूबर, नवम्बर महीने में होता है.

2017 में कब है दिवाली

19 अक्टूबर 2017 दिन वृहस्पतिवार को दिवाली मनाया जाएगा

दिवाली क्यों मनाया जाता है

दीवाली या दीपावली अर्थात “रोशनी का त्योहार” शरद ऋतु (उत्तरी गोलार्द्ध) में हर वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिंदू त्योहार है। दीपावली भारत के सबसे बड़े और प्रतिभाशाली त्योहारों में से एक है। यह त्योहार आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है।

भारत में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दिवाली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदों की आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं.

शास्त्रों के अनुसार दिवाली के दिन ही अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटे थे. अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लसित था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं

दिवाली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दिवाली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा कर सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दिवाली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।

 

दिवाली कहाँ मनाते है –

यह भारत का प्रमुख त्यौहार है ही इसके अलावा दिवाली नेपाल में भी धूम धाम से मनाया जाता है. और भी देश है जहा दिवाली मनाई जाती है.- श्रीलका, पाकिस्तान, म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिजी, मॉरीशस, केन्या, तंजानिया, दक्षिण अफ्रीका, गुयाना, सूरीनाम, नीदरलैंड, कनाडा, ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, और संयुक्त राज्य अमेरिका। भारतीय संस्कृति की समझ और भारतीय मूल के लोगों के वैश्विक प्रवास के कारण दीवाली मानाने वाले देशों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। कुछ देशों में यह भारतीय प्रवासियों द्वारा मुख्य रूप से मनाया जाता है.

धनतेरस यानि धन्वन्तरी की पूजा

धनतेरस के दिन भगवान धन्वन्तरी की पूजा की जाती है. वह समुंद्र मंथन से नारायण के यांश के रूप में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे. वह समस्त वेदों के ज्ञाता गरुड़ के शिष्य और भगवान् शंकर के उप शिष्य है. समस्त जगत को निरोग कर मानव समुदाय को दीघार्यु रखने की शक्ति उनके पास है. लाल कपडे की बाती बनाकर सरसों या करंज का तेल भरकर इसी जलाये. दीप निकलने से पहले इसकी पूजा करे. चौमुखी दिया निकालना भी लाभदायक होता है. इससे धन, समृधि, आरोग्य और आयु की प्राप्ति होती है. इसे बहार निकालने से पहले पुरे घर में घुमाया जाया है. ताकि सारी नकारात्मक उर्जा बहार निकल जाये.

इस दिन धातु की खरीद का विशेष महत्व होता है, क्योंकी धातु शुद्ध होता है. नये बर्तन को खाली न रखे. इनमे फल या मिठाई भर देना चाहिए. बर्तन पर स्वासित्क का चिन्ह बनाकर धुप, दीप अक्षत से इनकी पूजा करने से घर में समृधि और आरोग्य का प्रवेश होता है.

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माँ लक्ष्मी की पूजा

लक्ष्मी पुजन पुरे विधि-विधान से किया जाना अति आवश्यक है. तभी देवी लक्ष्मी की कृपा तुरंत ही प्राप्त होती है. पूजन के समय जरुरी है तीन पूजा की थाली शास्त्रों के अनुसार सजाई जाये. पूजा की थाली तिन होनी चाहिए. पहली थाली में 11 दीपक समान दुरी पर रख कर सजाये. दूसरी थाली में पूजन समाग्री इस क्रम में सजाये – सबसे पहले धनि (खिल), बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभुष्ण, चन्दन का लेप, सिंदूर, कुमकुम, सुपारी और थाली के बिच में पान रखे. तीसरी थाली में स क्रम में सामग्री सजाये – सबसे पहले फुल, दूर्वा, चावल, लौंग, इलाइची, केसर-कपूर, हल्दी चुने का लेप, सुंगधित पदार्थ, धुप, अगरबती, और एक दीपक. इस तरह मा लक्ष्मी की पूजन करे. माँ लक्ष्मी आपके घर को धन-धान से भर देंगी.

माँ लक्ष्मी को कमल का फुल पसंद है. महालक्ष्मी के चित्रों और प्रतिमाओ में उन्हें कमल के पुष्प पर विराजित दर्शया गया है. इसके पीछे धार्मिक कारण तो है साथ ही कमल के पुष्प पर विराजित माँ लक्ष्मी जीवन प्रबंधन का संदेश भी देती है. लक्ष्मी धन की देवी है. इनका धन से सम्बन्ध है. इसका नशा सबसे अधिक दुष्प्रभाव देनेवाला है. धन मोह-माया में डालने वाला है और जब धन किसी व्यक्ति पर हावी हो जाता है तो व्यक्ति बुरे के रास्ते पर चल देता है. कमल पर माँ लक्ष्मी के विराजित होने के बाद भी उसी घमंड नहीं होता, वह सहज ही रहती है. इसी तरह धनवान व्यक्ति को भी सहज रहना चाहिए, जिससे उस पर माँ लक्ष्मी हमेशा प्रसन्न रहे.

दिवाली का इतिहास

प्राचीन हिंदू ग्रन्थ रामायण में बताया गया है कि, कई लोग दिवाली को 14 साल के वनवास पश्चात भगवान राम व पत्नी सीता और उनके भाई लक्ष्मण की वापसी के सम्मान के रूप में मानते हैं। अन्य प्राचीन हिन्दू महाकाव्य महाभारत अनुसार कुछ दिवाली को 12 वर्षों के वनवास व 1 वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडवों की वापसी के प्रतीक रूप में मानते हैं। कई हिंदु दिवाली को भगवान विष्णु  की पत्नी तथा उत्सव, धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी से जुड़ा हुआ मानते हैं। दिवाली का पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा दूध के लौकिक सागर के मंथन से पैदा हुई लक्ष्मी के जन्म दिवस से शुरू होता है।

दीपावली की रात वह दिन है जब लक्ष्मी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे शादी की। लक्ष्मी के साथ-साथ भक्त बाधाओं को दूर करने के प्रतीक गणेश संगीत, साहित्य की प्रतीक सरस्वती; और धन प्रबंधक कुबेर को प्रसाद अर्पित करते हैं कुछ दीपावली को  भगवान् विष्णु की वैकुण्ठ में वापसी के दिन के रूप में मनाते है। मान्यता है कि इस दिन लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं और जो लोग उस दिन उनकी पूजा करते है वे आगे के वर्ष के दौरान मानसिक, शारीरिक दुखों से दूर सुखी रहते हैं।

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7 वीं शताब्दी के संस्कृत नाटक मे नागानंद में राजा हर्ष ने इसे दीपप्रतिपादुत्सव: कहा है जिसमें दिये जलाये जाते थे और नव दुल्हन और दूल्हे को तोहफे दिए जाते थे. 9 वीं शताब्दी में राजशेखर ने काव्यमीमांसा में इसे दीपमालिका कहा है जिसमें घरों की पुताई की जाती थी और तेल के दीयों से रात में घरों, सड़कों और बाजारों सजाया जाता था।फारसी यात्री और इतिहासकार अल बेरुनी, ने भारत पर अपने 11 वीं सदी के संस्मरण में, दीवाली को कार्तिक महीने में नये चंद्रमा के दिन पर हिंदुओं द्वारा मनाया जाने वाला त्यौहार कहा है

 

 

माँ लक्ष्मी के प्राथना –

असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

अनुवाद:

असत्य से सत्य की ओर।
अंधकार से प्रकाश की ओर।
मृत्यु से अमरता की ओर।(हमें ले जाओ)
ॐ शांति शांति शांति।।

 

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