Family story – कहानी एक बूढ़े माँ-बाप की

Family story

 

“तुम चिंता मत करो. कल सुबह होती ही खाने का कुछ-न-कुछ उपाए करता हूँ.” 80 वर्षीय नन्हू खाट पर लेटे-लेटे पत्नी को बोल रहा था –“मैं अभी जिन्दा हूँ और जब तक जिन्दा रहूँगा तुमको किसी चीज का कमी नहीं होने दूंगा.”

नन्हू की पत्नी जो दुसरे खाट पर सोई थी. कुछ बोली नहीं. झोपड़ी में पूरी तरह अँधेरा था. दिय तो उनकी पत्नी ने बुझा दिया था. मिटटी का तेल ख़त्म हो जाएगा तो कल पूरी रात अँधेरे में ही गुजारनी होगी.

“सो गई क्या तुम?” कुछ ऊतर नहीं पाने पर नन्हू ने पत्नी से पूछा.

“नहीं जगी हूँ.”

“भूख लगी है?” उदास आवाज सुनाई दिया तो नन्हू ने पूछ लिया. भूख तो उसे भी लगा था और नींद भी नहीं आ रहा था.

“नहीं भूख नहीं लगी है.” अँधेरे में आखो के आसू पोछी और बढ़िया आवाज कर के बोली ताकि नन्हू ये ना समझे की रो रही है.

“भूख तो मुझे थोड़ी-थोड़ी आ रही. उतना भी नहीं है. मगर नींद ही नहीं आ रही है. जब तक पेट को पूजा नहीं दो. आखो में नींद आती ही नहीं.” करवट बदलते हुए नन्हू ने बोला.

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Family story  – दोनों भूखे सोये थे.

 

नन्हू भी ये बात जानता था की भूख से नींद नहीं आ रही है. उसकी पत्नी भी इसलिए जगी है. मगर क्या कर सकता है. जिस सहारे की आस उसने की वो तो खत्म हो गया. कितने लाड़-प्यार से पाला था उसको. सोचा था बुढ़ापा का सहारा होगा. कहते है लड़का बुढ़ापे का लाठी होता है. मगर उस लाठी का क्या हुआ? बीबी के आते ही माँ-बाप खत्म हो गये? जिसको ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाया. पकड़-पकड़ कर खाना खिलाया. आज वो एक बार देखने भी नहीं आ रहा की माँ बाप खाना खाया या नहीं. नन्हू की सांसे गहरी हो गई. और आखो से दो बूंद टपक पड़े. वह उठ कर बैठ गया. उसे अंदर घुटन होने लगी. वह खाट से उठा और झोपड़ी से बाहर आ गया.

सभी नींद की गोद में थे. मगर नन्हू से नींद कोसो दूर खड़ी थी. कोई पास था तो वो था बस याद. वह जाकर अमरूद के पेड़ के निचे बैठ गया. यही वह जगह था जहाँ वह बेचैनी से इधर-उधर घूम रहा था. तो किसी ने आकर बताया था –“बेटा हुआ है.” खुशी से झूम उठा था वह. सारा भविष्य का प्लान उसने वही कर लिया था. बेटे को अच्छे स्कुल में पढाऊंगा. जो कहेगा वो करुगा. फिर उसे बढ़िया सी नौकरी हो जाएगी और फिर हमारा दुःख खत्म. आराम से जिन्दगी बितायेगें. सब जगह ख़ुशी ही खुशी होगा. उसने तुरंत मिठाइयाँ मंगवाई और पुरे गावं में बटवाया. नाच-गाना सब हुआ. खूब उत्सव मनाया था उसने. गावं वाले देखते रह गए थे.

 

Family story  – बेटे को सारी खुशियाँ दी.

 

5 साल का था तब से ही नन्हू ने भैस खरीद कर लाया था. खाने पिने का हर चीज लाया था. जो उसके औकात में था. पढने के लिए स्कुल भी भेजा. जितना वह कर सकता था सब किया. एक बाप होने का पूरा फर्ज निभाया.

शादी भी धूम-धाम से हुआ. फिर नन्हू ने सोचा उसका जिम्मेदारियां खत्म हो गई. अब आराम करने के दिन आ गये. बैठ कर बहु के हाथो का खाना खाने का दिन आ गया. मगर जल्द ही उसका यह सोच टूटने लगा. घर में झगड़े शुरू हो गये. हर रोज किसी न किसी बात को लेकर झगड़ा हो जाता और यह दिन पर दिन बढ़ते गया. और एक दिन ऐसा आया बेटा भी साथ छोड़ गया. बेटा भी बीवी की तरफ हो गया और उल्टा माँ-बाप को ही दो बाते सुना देता. और फिर अंत में ऐसा हुआ जिसे नन्हू ने बुढ़ापे का लाठी समझा. उसने हो बुढ़ापे में साथ छोड़ दिया. और बूढ़े-बूढी को अलग कर दिया.

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Family story  – अब उसे फिर से काम पर जाना था.

 

बुढ़ापे में जहाँ नन्हू ने आराम से जीवन बिताने का सोचा था. वही अब फिर से काम करना पड़ा. बूढी पत्नी को अब फिर अपना चूल्हा जलना पड़ा. इसमें कभी हाथ जल जाते तो कभी कुछ हो जाता. आज घर में बनाने के लिए कुछ भी नहीं था. तो दोनों भूखे पेट सो रहे थे. मगर नींद कहाँ आनी. पिछली बाते याद कर बस रोना आ जाता.

नन्हू को बैठे-बैठे ठण्ड सा लगा. वह उठ कर फिर झोपड़ी में चला गया. उसकी पत्नी सो चुकी थी. उसने चादर उठाकर उनपर डाल दिया. और खुद आकर खाट पर लेट गया. कल से फिर काम पर जाना है. बेटा अपना नहीं जुआ तो क्या हुआ. मैं अभी जिन्दा हूँ और जब तक मैं रहूँगा किसी चीज का कमी नहीं होने दूंगा.

नन्हू चादर उठाया और फिर सोने का प्रयास करने लगा.

 

 

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