Gudi Padwa Indian Festival – गुड़ी पड़वा का त्यौहार

Gudi Padwa

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 Gudi Padwa – कब मनाते है?

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा के दिन गुड़ी पड़वा का त्यौहार मनाते है. इस वर्ष प्रतिपदा या युगादि भी कहा जाता है. गुड़ी का अर्थ ‘विजय पताका’ होता है. ‘युग’ और ‘आदि’ शब्दों की संधि से बना है ‘युगादि’. अंगेजी कैलेंडर के मार्च या अप्रैल के महीने में यह त्यौहार आता है.

Gudi Padwa – कहाँ और कौन मनाता है?

यह हिन्दुओ का विशेष त्यौहार है. इस दिन हिन्दुओ का नववर्ष का आरम्भ होता है. यह त्यौहार पुरे भारत भर में मनाया जाता है. आन्ध्र प्रदेश और कर्नाटक में ‘उगादि’ और महाराष्ट्र में यह पर्व ‘गुड़ी पड़वा’ के रूप में मनाया जाता है.

आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में सारे घरो को आम के पेड़ की पतियों के बन्दनवार से सजाया जाता है. सुखद जीवन के आशा के साथ-साथ सुख, समृद्धि, और अच्छी फसल के भी परिचायक है. ‘उगादी’ के दिन ही पंचांग तैयार होता है.

गुड़ी पड़वा के अवसर पर आन्ध्र प्रदेश में घरो में प्रसादम तीर्थ के रूप में बाटा  जाता है. कहा जाता है की इसका निराहार सेवन करने से मानव निरोगी बना रहता है. चरम रोग भी दूर होता है. इस पेय में मिली वस्तुए आरोग्यप्रद होती है.  महाराष्ट्र में पूरन पोली या मीठी रोटी बनाई जाती है. इसमें जो चीजे मिली जाती है वो है गुड, नमक, निम् के फुल इमली और कच्चा  आम. आम बाज़ार में मौसम से पहले ही आ जाता है मगर आन्ध्र प्रदेश , कर्नाटक, और महाराष्ट्र में इसी दिन से आम खाया जाता है. नौ दिन तक मनाया जाने वाला यह त्यौहार दुर्गापूजा के साथ-साथ, रामनवमी को राम और सीता के विवाह के साथ सम्पन्न होता है.

 Gudi Padwa – क्यों मनाते है?

कहते है की शालिवाहन नामक एक कुम्हार के पुत्र ने मिटटी के सैनिको की एक सीना बनाई और उस जल छिडककर उनमे प्राण डाल दिया और इस सेना की मदद से शक्तिशाली शत्रुओ को पराजित किया. इस विजय के प्रतिक के रूप में शालिवाहन शक का प्रारम्भ हुआ. कई लोगो की मान्यता है की इसी दिन भगवान् राम ने बाली के अत्याचारी शासन से प्रजा को मुक्ति दिलाई थी. बाली के तरस से मुक्त हुई प्रजा ने घर-घर में उत्सव मनाकर ध्वज फहराए. तब से अभी तक घर-घर ध्वज फहराने के प्रथा चली आ रही है. इस दिन पुरानी ध्वज को हटाकर नई ध्वज लगाया जाता है.

Gudi Padwa

 

इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निमार्ण किया था. इसमें मुख्य रूप से ब्रह्माजी और और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओ के सहित रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है. इस दिन से नया संवत्सर शुरू होता है. इसलिए इस तिथि को नवसंवत्सर भी कहते है.

महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सुयोद्य से सूर्यास्त तक दिन, महिना और वर्ष की गणना करते हुए पंचांग की रचना की. वर्ष के साढ़े तिन मुहुतारे में गुड़ी पड़वा की गिनती होती है. शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है.

(Gudi Padwa)  गुड़ी पड़वा इतिहास के नजरो में

आज से 2054 वर्ष पूर्व उज्जयनी नरेश महाराज विक्रमादित्य ने विदेशी शासक शको से भारत का रक्षा किया और इसी दिन से काल गणना आरम्भ किया. राष्ट्र ने भी उन्ही महाराज के नाम से विक्रमी संवत कह कर पुकारा.  महाराजा विक्रमादित्य ने भारत की ही नहीं बल्कि समस्त विश्व की सृष्टि की. सबसे प्राचीन कालगणना के आधार पर ही प्रतिप्रदा के दिन को विक्रमी संवत के रूप में मनाया जाता है. इसी दिन भगवन रामचंद्र के राज्यभिषेक हुआ था. यह दिन ही वास्तव में असत्य पर सत्य की विजय दिलाने वाला है. इसी दिन महाराज युधिष्टिर का भी राज्याभिषेक हुआ.

 

 

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