3 Short hindi stories with moral values शार्ट हिंदी कहानिया मोरल

Today we bring to you short hindi stories with moral values. Which will surely help in you life. इस पोस्ट में आपको बहुत सारी छोटी छोटी कहानिया मिलेंगी | जो मानवीय मूल्यों से भरी हैं और मजेदार भी हैं | आशा है आप लोगों को पसंद आएगी |

3 Short hindi stories with morals values

These are some short stories written below which inspirational , motivational , emotional with moral values. Read them and give feedback in comment box.

1. Short hindi stories for family

सोहन 10 साल का था जब उसके माँ-बाप गुजर गये. तब वह 6th class में पढता था. माँ-बाप के मरने के बाद सारी जिम्मदारी उसके बड़े भाई दिवाकर पर आ गई.जब दिवाकर के माता-पिता का देहांत हुआ. दिवाकर का शादी हो चूका था. दिवाकर और उसकी पत्नी ने बहुत ही सेवा किया ‘माता-पिता’ का. उनके इलाज में सारा कुछ बेच डाला. मगर नियति को कुछ और मंजूर था. माता-पिता के मरने के बाद सोहन की सारी जिम्मदारी दिवाकर पर आ गई. दिवाकर ने भी अपना जिमादारी बखूबी निभाया. किसी चीज की कमी नहीं होने दिया सोहन को.

This is Short family story in hindi.

उसे सब कुछ बेच कर पढाया

सोहन को पढने के लिए शहर भेज दिया. खर्चे के लिए बची हुई खेत गिरवी रख दिया. घर के हालत भी बिगड़ने लगे. कभी-कभी चूल्हे में आग भी नहीं जलने की नौबत आ गई. फिर भी सोहन के लिए पढाई का खर्च देना जारी रखा.सोहन ने भी बढ़िया से पढाई जारी रखा. उसे एक बढ़िया गवर्नमेंट job भी मिल गई. दिवाकर बहुत खुश हुआ. उसे अब लगा रहा था की पिता की दी हुई जिम्मेदारी अच्छे ढंग से निभा पाया. उसे खेत बिक जाने का डर नहीं था. न ही कभी अपने आपको उदास पाया.सोहन की job मिलने की ख़ुशी सबको थी.सब कुछ ठिक चलने लगा. उसी बिच दिवाकर ने सोहन की शादी भी करा दी. बहुत ही धूम-धाम से शादी हुआ. दिवाकर ने बड़े भाई का फर्ज बहुत ही बढ़िया तरीके से निभाया.

वह ही आँख दिखाने लगा

दिन बीतने लगे. सोहन की पत्नी बड़े भाई के लडको से दूर ही रहती. हमेश उलाहना करती. ये सारी बातें दिवाकर सुना और चुप हो जाता. यही सोचता की औरते कर रही है करती रहे. हम भाई तो अच्छे है. उधर सोहन की पत्नी, सोहन के भी कान भरने लगे. सोहन शुरू-शुरू में इन बातो को नहीं सुना मगर रोज-रोज रही सुन कर वह अपनी पत्नी के बातो पर विश्वास करने लगा.एक बार सोहन घर आया था. उसके दिमाग में गलत बाते भर चुकी थी. उसकी बुधि भ्रष्ट हो चकी थी. वह दिवाकर के पास गया. दिवाकर अभी खेत से आया था. हाथ मुहँ धो रहा था. सोहन उसके पास गया और बोला “भैया आपसे कुछ बात करना है.”

“हां बोलो क्या बात है.बोलो.”

“भैया हमे अलग कर दो. यह रोज-रोह का ड्रामा ठिक नहीं है. हमलोग आपना अगल बनाकर खायेंगे.” सोहन बोला

दिवाकर वहाँ से उठ गया. उसकी आखे लाल हो गये. उसने इस बात की कल्पना भी नहीं किया था.

सोहन ही घर में दिवार बनाया

“क्या हो गया. ऐसी बाते क्यों कर रहा है. घर में छोटी-छोटी बाते होती रहती है. इसका मतलब अलग हो जायेंगे. पागल हो गया है तू.” भींगी आखो से दिवाकर ने बोला.“मैं यहाँ रहता नहीं हूँ. आपलोग मेरी पत्नी को दुःख दे रहे है. मैं ही कमा कर खिला रहा हूँ और मेरी ही पत्नी के साथ अच्छे से नहीं रहते. और हां आपने जितना मुझे किया था मैं भी आपलोग को उतना कर दिया हूँ.” सर झुकरकर खड़े सोहन ने बोला.अगले दिन आगन में दिवार बनाया जा रहा था. दिवाकर अपने घर में बैठ बीती बाते याद कर रहा था. उधर सोहन दिवार खड़ी कर रहा था. वही सोहन जो कभी बच्चा था, वही सोहन जिसके खाए बिना कभी खाना नहीं खाता था. आज वही सोहन दीवारे खड़ी कर रहा था.

आपको यह story कैसा लगा जरुर कमेंट करे. आपके पास भी ऐसी story है तो हमे भेजिए. हमलोग उसे publish करेंगे.

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2. Short hindi stories एक कहानी वृद्धश्रम की

मनुष्य अपनी इच्छाये पूर्ति करने के लिए, अपने सुख के लिए सारी हदें पार कर देता है. यह खास गुण “मनुष्य कहे जाने वाले प्राणी में होता है. यह मनुष्य इतना चालक, इतना स्वार्थी और निर्लज हो गया है की अपने जननी को भी नहीं पहचान पा रहा है. जिस पिता को ‘स्वर्ग से भी ऊँचा” कहा गया है. उन्हें घर से निकलते देर नहीं लग रही. Moral story in hindi -एक कहानी जो आपकी जीवन बदल देगी.जो माता-पिता अपनी जवानी की कमाई, अपनी सारी-सुख सुविधा अपने चार बच्चो के पालन पोषण में लगा देते है. वही माता-पिता बूढ़े होने पर बच्चो पर बोझ हो जा रहे है. चार बच्चे मिलकर भी उनका खर्च नही उठा पाते. उनको दवा के लिए, दो वक्त के भोजन के लिए तरसना पड़ रहा है. बुढ़ापे में उनकी लाठी बनने के बजाये उनको वृद्धश्रम छोड़ देते है.

This is a Short Emotional Story in hindi.

ऐसी ही एक story आपलोग के सामने रख रहा हूँ जो की वृद्धश्रम की एक माता जी का है. –

मैं उनके सामने जमीं पर बैठ गया. और भी औरते उनके आस-पास खड़ी थी. और सभी के पास ऐसी ही एक कहानी थी. उनका एक लड़का और एक लड़की थी. लड़के को पढ़ा-लिखा दिया और उसे के अच्छी सी job भी मिल गई. उसकी शादी भी धूम-धाम से हो गई. छोटी लड़की को भी पढ़-लिखा कर बढ़िया घर में शादी कर दिया. सब कुछ अच्छा चल रहा था.तभी अचानक एक दिन उनके पति की डेथ हो गया. उनके मरने के बाद से उनका समय ख़राब हो गया. घर में कोई पूछने वाला नहीं था. लड़का अपने बीवी में इतना व्यस्त हुआ की माँ का ख्याल ही खत्म हो गया.

बहु को उनका काम पसंद नहीं आता. धीरे-धीरे उनसे घृणा होने लगा. रोज घर में कलह होने लगा.

उनको न घर में कुछ छूने को मिलता, न घर में कहने को. उनके लिए घर से बहार एक कोठरी दे दिया गया.

यहाँ तक की बच्चो को भी छूने नहीं देती.

फिर एक दिन आया. जब उनको देखना भी ख़राब लगने लगा और उनको शहर से दूर एक महिला वृद्धश्रम में रख दिया.

आगे कहानी मजेदार होती है

उनके पास एक छोटा-सा mobile है जिसमे न तो पैसा है और न ही किसी का call आता है. बेटी कभी-कभी कर देती है. सरकार के तरफ से 150 रूपये मिलता है. जिसे लाने जाने-आने में 50 रुपया लग जाता है. उसमे सुगर भी हो गया. उसका कहाँ से इलाज कराएँ. सरकार की भी योजनाये उनके पास नहीं पहुच पाती. वहाँ 400-500 वृद्ध महिलाये थी जिनकी सबकी अपने एक कहानी थी. यह तो मात्र एक छोटे से राज्य की, छोटे से शहर की, छोटे से जगह की कहानी थी. इस देश में ऐसे न जाने कितनी कहानियां पड़ी है. मगर सभी के पास बस एक सवाल है – “क्या इसी दिन के लीये पाला-पोसा? 9 महीने पेट में रखा, अपनी सारी ख़ुशी लुटा दी इस दिन के लिए ?”

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3. Short hindi stories with moral values

दोपहर हो चला था. मई-जून की तपती धुप शरीर को जला देने वाली थी. मैं अपने दूकान पर बैठा था. यात्री स्टेशन रुकते नहीं. जिनकी ट्रेन अभी घंटे-दो घंटे लेट थी वही थे. स्टेश पर ही हमारी श्मोशे–चाय का दुकान था. दूकान पर मैं रहता. और मेरा 20 वर्षीय बेटा कभी-कभी हाथ बटाने आ जाता. आज वह आया नहीं था. आज उतने ग्राहक भी नहीं थे.

इसलिए मैं उतना busy नहीं था.

मैं कितने ही देर से देख रहा था. एक बुढ्ढा आदमी जिनकी उम्र शायद 65-70 साल होगा. उनके साथ एक औरत थी. जिनकी उम्र 60 के आस-पास लग रहा था. वह आदमी एक मैला, उजला-सा कुर्ता-धोती और कंधे पर लाल गमछा लिया था. जो की इतना पुराना था की रंग बदल गया था. सर पर आधे बाल थे और हाथो में एक गठरी थी.

शायद गावं से कही जा रहे थे.

True Heart Touching Story – उनका लम्बा सा इंतजार

वे लोग सुबह से ही स्टेशन पर बैठे थे जब भी कोई ट्रेन आती तो वह दोनों बड़े ही ध्यान से देखते. वह व्यक्ति उठ कर आने-जाने वाले रास्तो को बड़ी बेश्बी से देखता. फिर निराश होकर चला जाता. सुबह से दोपहर हो गया. वे लोग अभी वही बैठे थे.शाम के 5 बज गये. मैंने देखा तो वे अभी भी वही बैठे थे. उसी जगह. कही हिले भी नहीं थे. मैं भी अब जानना चाह रहा था की क्या बात है? कहाँ जाना है?

किसका wait कर रहे है?

रात के 8 बज गये. चारो तरफ अँधेरा फ़ैल गया था. यात्री अपने घरो को जा रहे थे. स्टेशन की लाइट्स जल चुकी थी. तभी एक ट्रेन आई. यात्री एक-दुसरे को धक्का देकर आगे जाने लगे. इस समय सभी को ही जल्दी होंती है अपने-अपने घर जाने की. मगर वे लोग अभी वही बैठे थे. मैंने अपने दूकान को बेटे के हवाले किया और वहाँ चल पड़ा जहा वे लोग बैठे थे. “

 बेटा लेने आएगा?

“आपलोग किसका wait कर रहे है?” मैं उनके पास जाकर पूछा.

पहले तो उन्होंने एक दुसरे का मुहँ देखा फिर उनकी पत्नी ने बोला –

“हमारा बेटा हमें लेने आने वाला है. वह अभी तक आया नहीं. हमलोग उसी का इंतजार कर रहे है.”

“आपलोग को पक्का पता है की इसी स्टेशन पर बोले है आने के लिए. आपलोग ने फ़ोन नहीं किया उन्हें?” मैंने पूछा

वह व्यक्ति ऐसे ही बैठे रहे. उनके चेहरे पर उदासी दिख रही थी. मगर माता जी के चहरे पर अभी भी इंतजार दिख रहा था. उन्हें लग रहा था अभी ही उनका लड़का आयेगा. “हां उसने तो यही बोला था. फ़ोन तो हमारे पास है नहीं. हां उसने एक पता लिख कर दिया था.” फिर उन्होंने अपने पति से बोली – “पता दिखाइए ना, कहाँ रखे है? कब से बोल रही हूँ की किसी से पता दिखा लीजिये.”“ये लो बेटा, मेरे बेटे का पता है. उसने कहा था अगर आने में लेट हो जाये तो किसी को दिखा देना. मगर उन्होंने किसी को दिखाया ही नहीं.” उन्होंने वह कागज पर लिखा पता मुझे देते हुए बोली.

True Heart Touching Story – बेटे के प्रति उम्मीद

उन दोनों लोग का चेहरा मैंने एक बार फिर देखा. उनमे एक आशा की हल्की उम्मीद दिखी.

मैंने वह पता लिया और पढने लगा. जैसे-जैसे उसको पढना शुरू किया मेरे आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा. मेरे होश उड़ गये. जब पढना बंद किया तो मेरे हाथ कांप रहे थे. सीना जोर-जोर से धड़क रहा था. क्या ऐसे भी पुत्र होते है? ऐसी भी संताने है?

पूरी जवानी जिसे पलने पोसने में लगा दिया, आज बुढ़ापे में ऐसा कर जाएगा?

मेरे दिमाग में हजारो प्रश्न उत्पन्न होने लगा.

 बेटे का पत्र

“ये मेरे माता-पता है. मुझे पैसे का जरुरत था इसलिए मैं घर बेच दिया और उनसे बोला का आप लोग भी मेरे साथ रहोगे. मैं इनको अपने साथ रखना चाहता हूँ. मगर मेरी बीवी उनको अपने साथ नहीं रखना चाहती. अगर मैं अपने साथ ले जाता तो रोज-रोज झगड़ा होता.

इसलिए आपने निवेदन है की आप इनको वृधाश्रम में छोड़ आइयेगा.”

मैंने उनके चेहरे पर फिर से देखा. वह बोल रही थी – “मैं कब से बोल रही हूँ. यह पता दिखाओ.

अब तक हमलोग अपने बच्चे के पास होते न”

“हाँ सच कह रही हो” उनके पति ने भी हल्का मुस्करा दिया.

“आपलोग आज मेरे यहाँ चलिए कल मैं आपलोग को आपके बेटे के पास पंहुचा दूंगा.”

मैं भी अपने मन में निश्यय कर चूका था. नहीं भेजूंगा ‘वृधाश्रम”. अपने पास रखूंगा.

मैं धीरे से उनकी गठरी उठाई और चल पड़ा अपने घर के लिए.

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